मंगलवार, 22 अप्रैल 2025

कुर्मी विवाह में देवलोक स्थापना

कुर्मी विवाह में देवलोक स्थापना 
प्रमोद गुप्ता/बेमेतरा/साजा - छत्तीसगढ़ी लोक सांस्कृतिक परंपरा में वैवाहिक संस्कार को सभी समुदायों द्वारा प्राथमिकता दी जाती है। इसे अपने पुरखों के चलागन के अनुरुप पूर्ण लोक आनुष्ठानिक रुप दिया जाता है। वहीं छत्रपति शिवाजी, कुर्म वंश के कृषक समुदाय के कुर्मियों द्वारा अपने वैवाहिक कार्यक्रम में देवलोक की स्थापना अत्यंत विशिष्टताओं के साथ करते हैं। इसे लोक अनुष्ठानिक रुप से मातृका पूजन अर्थात् मायन के दिन अपने पितर-पुरखों और इष्ट देवों को स्मरण करने की अनोखी परंपरा प्रचलित है। इस कड़ी में साजा गांव के कुर्मियों द्वारा अपने देवलोक में प्रथम पूज्य श्री गणेश, कुल देव हनुमान और अपने दिवंगत पुरखों के फोटो स्थापित कर अखंड दीप प्रज्वलित किया जाता है। वहीं उनकी प्रथम पूजा-अर्चना की जाती है। इसके लिए विशेष पकवान घर की बहूओं द्वारा बनाया जाता है। गैबहोर गोत्र की प्रौढ़ शांति बाई वर्मा, समाजसेवी बिंदेश्वरी वर्मा, दल्लू सिंह वर्मा, मनहरण वर्मा, खोम लाल ने लोक संस्कृति कर्मी राम कुमार वर्मा से संवाद करते हुए बताया कि मायन के दिन अपने कुल देवी-देवताओं और दिवंगत पितर-पुरखों और विवाह मंड़प में लगने वाली सामग्रियों के पूजन का होता है। इसके लिए मुख्य रुप से गेहूं की माय-मौरी, रोंठ, मुठिया आदि घी का मोवन डालकर तेल में तल कर बनाते हैं। घर में वर या कन्या के विवाह होने पर उसकी हथेली में पांच-सात रोंठ नामक मीठा और मोटी रोटी कुंवारी धागा में बांधकर मंडप के चारों ओर लड़कों में पांच और लड़कियों में साथ भांवर घुमाया जाता है। इसमें गांव के वरिष्ठ और विवाहित गोत्रज जन, दामाद-बेटी, बेटा-बहू आदि शामिल होते हैं। वही अन्यत्र स्थान पर निवासरत गोत्राजों को निमंत्रित किया जाता है। वे अपने परिजनों सहित देव काज मान कर अवश्य उपस्थित होते हैं। मायन के दिन उपस्थित होकर देवलोक की पूजा-अर्चना में उत्साह के साथ शामिल होते हैं। ऐसे में सभी गोत्रजों को घर वालों के द्वारा नया कपड़ा देकर सम्मानित किया जाता है और रात्रि में भोजन के पश्चात हुए शेष दिनों के वैवाहिक कार्यक्रम में शामिल होते हैं। यह अनोखा देव स्थान व लोक अनुष्ठान कुर्मियों में देखने को मिलता है। जब भी अपने पुरखों को वैवाहिक कार्यक्रमों में विशेष रुप से निमंत्रित कर देव लोक में कुल देवी-देवताओं और पुरखों को अनुष्ठान के द्वारा प्रसन्न करने का प्रयास किया जाता है। 

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