विरोध, आलोचना और परंपरा के बीच निभाया अंतिम धर्म
पिता ने कहा था - मेरी बेटियां ही हैं मेरा सब कुछ
ग्राम नगोई विखं तखतपुर (बिलासपुर) के श्रेष्ठी कुर्मी समाज में एक बेटी ने की नई सामाजिक पहल
बिलासपुर 26 जुलाई 2026 - श्रेष्ठी कुर्मी समाज में पहली बार एक बेटी ने अपने पिता का पिंडदान कर वर्षों पुरानी सामाजिक परंपरा को नई दिशा दी है। तखतपुर विकासखंड के ग्राम नगोई निवासी कृषक देवनारायण कौशिक के निधन के बाद कक्षा नवमीं में पढ़ने वाली उनकी बेटी आस्था कौशिक ने प्रयागराज में विधि-विधान से पिंडदान कर पिता की अंतिम इच्छा पूरी की। विरोध, सामाजिक आलोचना और धार्मिक आपत्तियों के बीच उठाया गया यह कदम अब पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गया है।
तखतपुर के ग्राम नगोई निवासी कृषक देवनारायण (गौतम) कौशिक का 20 जुलाई को निधन हो गया। परिवार में पत्नी सुनीता कौशिक (जो शिक्षिका हैं), एक पुत्र तथा दो पुत्री है। बड़ी पुत्री अंबिकापुर में पढ़ाई कर रही है, वहीं पुत्र अर्थव कौशिक छोटा होने के कारण अंतिम संस्कार के बाद पिंडदान की जिम्मेदारी दूसरी नंबर की बेटी आस्था ने संभाली।
सरस्वती शिशु मंदिर तखतपुर में कक्षा 9 वीं की छात्रा कु. आस्था ने बताया कि उनके पिता हमेशा रिश्तेदारों और परिवार के लोगों से कहा करते थे कि मेरी बेटियां ही मेरा सब कुछ हैं, मेरा पिंडदान भी मेरी बेटी ही करेगी। पिता की इसी अंतिम इच्छा को उन्होंने अपना संकल्प बना लिया।
कु. आस्था ने बताया कि प्रयागराज में पिंडदान कराने के दौरान पुरोहितों की ओर से आपत्ति भी हुई, वहीं समाज और कुछ रिश्तेदारों की आलोचना का भी सामना करना पड़ा। हालांकि फूफा, बुआ, मामा, चाचा तथा विशेष रूप से फौजी चाचा मनोज कौशिक का पूरा समर्थन मिला। उन्होंने बताया कि उनके दादा स्वर्गीय तुलसी राम कौशिक द्वारा मनोज कौशिक के पालन-पोषण और उन्हें सेना तक पहुंचाने की प्रेरक कहानी तथा फौजी चाचा के साहस ने उन्हें अपने निर्णय पर अडिग रहने की शक्ति दी। कु. आस्था का कहना है कि यदि बेटियां माता-पिता की सेवा कर सकती हैं, तो अंतिम संस्कार और पिंडदान भी कर सकती हैं। उनका मानना है कि धार्मिक परंपराओं में समय के साथ सकारात्मक बदलाव होना चाहिए और बेटियों को सामाजिक संकोच छोड़कर आगे आना चाहिए।
पिता की इच्छा बनी बेटी का संकल्प
कु. आस्था कौशिक बताती हैं कि उनके पिता देवनारायण कौशिक बेटा-बेटी में कभी भेदभाव नहीं करते थे। वे अक्सर परिवार और रिश्तेदारों से कहते थे कि उनकी बेटियां ही उनका सबसे बड़ा सहारा हैं और उनका पिंडदान भी बेटी ही करेगी। पिता के निधन के बाद आस्था ने इसे केवल धार्मिक कर्म नहीं, पिता की अंतिम इच्छा और उनके विश्वास का सम्मान माना।
बेटियां भी निभा सकती हैं अंतिम धर्म
कु. आस्था कौशिक का कहना है कि समाज में बेटियां आज भी कई धार्मिक परंपराओं से दूर रखी जाती हैं। उनका मानना है कि समय के साथ सकारात्मक बदलाव जरूरी है और बेटियों को सामाजिक संकोच छोड़कर आगे आना चाहिए। उन्होंने प्रयागराज में अस्थि पूजन के नाम पर होने वाली अव्यवस्थाओं पर भी सवाल उठाए और कहा कि गांव के पुरोहितों द्वारा विधि-विधान संपन्न कर श्रद्धालुओं को अनावश्यक परेशानी से बचाया जा सकता है।
श्रेष्ठी कुर्मी समाज में पहली पहल, इसलिए आलोचना
कु. आस्था कौशिक ने बताया कि श्रेष्ठी कुर्मी समाज में अब तक किसी बेटी द्वारा पिता का पिंडदान किए जाने की जानकारी उन्हें नहीं है। यही वजह रही कि उनके निर्णय का कई लोगों ने विरोध किया और आलोचना भी की। हालांकि उन्होंने सामाजिक दबाव की परवाह नहीं की। उनका कहना है कि यदि उनके इस कदम से समाज में बेटियों के प्रति सोच बदलेगी तो यह उनके पिता के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
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