छत्तीसगढ़िया वेशभूषा में सजी युवतियों ने बरगा में किया भोजली विसर्जन

मांदर-ढोलक की थाप पर गांव में निकली भोजली की शोभायात्रा, घर-घर हुआ पूजन  

ग्राम भ्रमण कर पुराना तालाब में विधि-विधान से किया गया विसर्जन 
बेमेतरा 29 अगस्त 2026 - छत्तीसगढ़ की माटी में रची-बसी लोक परंपराओं और संस्कृति की अनूठी झलक जिलें के साजा ब्लाक के ग्राम बरगा में देखने को मिली, जहां पारंपरिक भोजली त्यौहार को पूरे उत्साह, उमंग और श्रद्धा के साथ मनाया गया। गांव की युवतियां छत्तीसगढ़ की पारंपरिक वेशभूषा धारण कर भोजली लेकर निकलीं और मांदर-ढोलक की थाप तथा लोकगीतों के बीच भोजली का गांव में भ्रमण कराया गया। इस दौरान पूरा गांव छत्तीसगढ़ी संस्कृति के रंग में रंगा नजर आया। 

पारंपरिक परिधान में निकली शोभायात्रा 
भोजली विसर्जन के अवसर पर युवतियों ने पारंपरिक परिधान धारण कर सिर पर भोजली रखकर गांव की गलियों में शोभायात्रा निकाली। मांदर और ढोलक की गूंज के साथ भोजली गीत गाते हुए युवतियां आगे बढ़ती रहीं। उनके साथ बड़ी संख्या में ग्रामीण भी शामिल हुए। जगह-जगह ग्रामीणों ने अपने-अपने घरों के सामने भोजली का स्वागत किया तथा पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की। 

घर-घर हुआ भोजली का पूजन 
गांव में भ्रमण के दौरान भोजली पहुंचने पर लोगों ने श्रद्धा के साथ उसका पूजन किया। कई घरों में महिलाओं और बुजुर्गों ने भोजली की आरती उतारी तथा परिवार की सुख-शांति, अच्छी फसल और समृद्धि की कामना की। भोजली के प्रति ग्रामीणों की आस्था और अपनापन पूरे आयोजन के दौरान दिखाई दिया। 
भोजली एक लोक संस्कृति, कृषि जीवन, प्रकृति प्रेम और भाईचारे से जुड़ी परंपरा 
भोजली केवल एक त्यौहार नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति, कृषि जीवन, प्रकृति प्रेम और आपसी भाईचारे से जुड़ी हुई परंपरा है। गांव में आज भी इस परंपरा को पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाया जाता है। नई पीढ़ी द्वारा पारंपरिक वेशभूषा धारण कर भोजली विसर्जन में शामिल होना छत्तीसगढ़ी संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक सुंदर पहल के रूप में देखा गया। 

लोकगीत और मांदर की थाप ने बांधा समां 
भोजली विसर्जन के दौरान मांदर और ढोलक की थाप पर पारंपरिक भोजली गीतों की गूंज से गांव का माहौल उत्सवमय हो गया। युवतियों और महिलाओं ने सामूहिक रूप से भोजली गीत गाए। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर वर्ग के लोग इस पारंपरिक आयोजन का हिस्सा बने। 
रीति-रिवाजों के साथ भ्रमण कर विसर्जन 
गांव की गलियों से होकर भोजली यात्रा पुराना तालाब पहुंची, जहां श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ भोजली का विसर्जन किया गया। विसर्जन के दौरान ग्रामीणों ने भोजली को नमन करते हुए गांव और क्षेत्र की खुशहाली की कामना की। 

नारियल भेंट की अनूठी परंपरा 
भोजली विसर्जन के साथ ग्राम बरगा में छत्तीसगढ़ की एक और लोकपरंपरा देखने को मिली। यहां जंवारा, गौरा-गौरी, भोजली, गणेश तथा मां दुर्गा विसर्जन के अवसर पर गंगा मैया को नारियल भेंट करने की परंपरा निभाई जाती है। 

तालाब में नारियल अर्पित 
विसर्जन के पश्चात तालाब में ग्रामीणों द्वारा नारियल अर्पित किए गए। इसके बाद गांव के बच्चे उत्साहपूर्वक तालाब में उतरे और तैराकी करते हुए पानी में अर्पित किए गए नारियल को प्राप्त किया। बच्चों की इस गतिविधि को देखने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण तालाब के किनारे मौजूद रहे। बच्चों में नारियल प्राप्त करने को लेकर खासा उत्साह देखने को मिला।

परंपरा व सामूहिक उत्सव की भावना 
यह परंपरा गांव की पुरानी लोकमान्यताओं और सामूहिक उत्सव की भावना को दर्शाती है। त्यौहार के धार्मिक पक्ष के साथ-साथ यह आयोजन ग्रामीणों के बीच आपसी मेल-जोल, भाईचारे और सामुदायिक सहभागिता को भी मजबूत करता है। 

नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ने का संदेश 
ग्राम बरगा में आयोजित भोजली उत्सव ने यह संदेश दिया कि आधुनिकता के दौर में भी छत्तीसगढ़ की लोक परंपराएं अपनी जड़ों से मजबूती से जुड़ी हुई हैं। युवतियों द्वारा छत्तीसगढ़िया वेशभूषा धारण करना, मांदर-ढोलक के साथ भोजली गीत गाना और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ विसर्जन करना नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने का सुंदर उदाहरण रहा। 

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