अक्ती : अक्षय तृतीया के मौके पर जगह-जगह दिखा उत्साह, परंपरा निभाने के लिए परिजन ने भी दिया साथ
बेमेतरा 20 अप्रैल 2026 - अक्षय तृतीया यानी अक्ती का पर्व केवल खेती-किसानी की शुरुआत का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह हमारे नन्हे-मुन्नों के लिए परंपराओं को जीने का एक उत्सव है।
इसी कड़ी में सोमवार को जिलें के बेरला ब्लाक के ग्राम बारगांव सहित समीपस्थ ग्राम बलौदी, मुड़पारखुर्द, तेलगा में बच्चों ने बड़ी ही श्रद्धा और उत्साह के साथ पुतय-पुतरी (गुड्डे-गुड़ियों) का विवाह कराया।
यह आयोजन भी किसी वास्तविक विवाह से कम नहीं था, जहां रस्मों की पवित्रता और बच्चों का उत्साह देखते ही बना। शादी की बेला में शहनाइयों तो गूंजी ही, गुड्ढे की बारात निकली और गुडिया का कन्यादान भी किया गया। इससे पहले बच्चों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ जुड़कर देवतला और तेल, हल्दी का आयोजन किया। सोमवार की सुबह होते ही फिजाओं में हल्दी की खुशबू महकने लगी। बाजे-गाजे की धुन पर नन्ही बालिकाओं ने मंडप के नीचे जमकर नृत्य किया। हल्दी की रस्म के दौरान बच्चों ने एक-दूसरे को गुलाल और हल्दी लगाकर खुशियां बांटी। दोपहर ठीक 3 बजे दूल्हे राजा (पुतरा) की बारात निकाली गई। गांव की गलियों में जब छोटी-छोटी टोलियां बाजे के साथ निकलीं, तो हर कोई ठिठक कर देखने लगा। बच्चों ने अपने गुड्डे-गुड़ियों को सुंदर नाम भी दिए थे, जो उनके प्रति उनके लगाव को दर्शाते हैं।
यह देखकर बहुत गर्व होता है कि हमारे बच्चे अपनी संस्कृति को इतने उत्साह से जी रहे हैं। सखी सहेली समूह ऐसी परंपराओं को जीवित रखने वाले हर नन्हे हाथ की सराहना करता है। इस पुतरा-पुतरी विवाह ने पूरे गांव में प्रेम और सद्भाव का संचार किया। बच्चों की इस मासूमियत भरी कोशिश में गांव के बड़े-बुजुर्गों का शामिल होना यह बताता है कि खुशियां मनाने के लिए किसी बड़े कारण की नहीं, बल्कि एक शुद्ध मन की आवश्यकता होती है।
कागज के फूलों से तैयार किया था बेहद खूबसूरत मंडप
विवाह की मुख्य विशेषताएं रही की बच्चों ने प्राकृतिक चीजों और कागज के फूलों से बेहद खूबसूरत मंडप तैयार किया था। दोपहर 2 बजे टिकावन का कार्यक्रम रखा गया। सबसे खास बात यह रही कि बच्चों के इस खेल में उनके पालकों (माता-पिता) ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और बड़ों की तरह ही टिकावन की रस्म निभाई। विवाह के इस अवसर पर अक्ती के पारंपरिक पकवानों का आनंद लिया गया।
परंपराओं का संरक्षण पीढ़ी-दर-पीढ़ी
छत्तीसगढ़ में पुतरा-पुतरी की शादी केवल एक खेल नहीं है, बल्कि यह भावी पीढ़ी को हमारे संस्कारों, वैवाहिक रस्मों और सामाजिक जुड़ाव से परिचित कराने का एक सशक्त माध्यम है। बारगांव के बच्चों ने जिस तरह से मंडप सजाया, हल्दी खेली और बारात निकाली, यह कई मायने में बेहद खास रहा।