दीपावली के एक दिन पहले गौरा-गौरी की स्थापना के लिए फूल कूटने की परंपरा से हुई शुरुआत
मिट्टी लाने से लेकर विसर्जन तक की है अनोखी है परंपरा
प्रमोद गुप्ता/बेमेतरा/बेरला/बारगांव 20 अक्टूबर 2025 - दीपावली पर्व पर छत्तीसगढ़ में मनाई जाने वाली भगवान गौरा-गौरी की पूजा विधिवत की जाती है। इस दरमियान दीपावली के एक दिन पहले ही रविवार को मटिया स्थित ब्रमबाबा चौक स्थित गौरा चौरा में भगवान गौरी-गौरा की स्थापना के लिए फूल कूटने की परंपरा से शुरुआत की गई।
गोड़ जाति की महिलाएं मटिया में ब्रमबाबा चौक स्थित गौरा चौरा में रविवार की रात को एकत्रित होकर गाजे बाजे व गीत के साथ फूल कूटने की परंपरा से शुरुआत की। तीन दिन तक प्रतिदिन शाम को पूजा की जाएगी, जिसमे पूरा मुहल्ले और गांवों का सहयोग रहता हैं।
लक्ष्मी पूजन के दिन भगवान गौरी-गौरा की स्थापना कर पूजा अर्चना कर रात्रि में बाजे-गाजे के साथ भगवान शिव की बारात निकाली जाएगी।
दूसरे दिन विधिवत पूजा कर तालाब में विसर्जन किया जाता है। इसमें सबसे प्रमुख बात यह होती है कि इस पूरे परम्परा में मिट्टी लाने से लेकर विसर्जन तक का काम पुरुष करते हैं और भगवान की सेवाएं महिलाएं करती हैं। इस अवसर पर पूरे कार्यक्रम में रामबाई ध्रुव के नेतृत्व में सरोज, गजरा, मोगरा ध्रुव, इंदिरा, जयश्री, अर्चना, तीजन, बेबी ध्रुव, कृष्णा, छबि ध्रुव, मोनिका ध्रुव, दुलारी ध्रुव, सुनीता साहू, गिरवर , मनोहर पाटिल, तिहारू, घुनुराम का सहयोग रहा।
फूल कूटने की परंपरा से होती है शुरुआत - समाज की रामबाई ध्रुव ने बताया कि भगवान गौरी गौरा की स्थापना के लिए दीवाली के एक दिन पहले फूल कूटने की परंपरा से इसकी शुरुआत होती है। इसके लिए भगवान के स्थल से मिट्टी लेने के लिए बाजे गाजे के साथ मंदिर जाते हैं। वहां से मिट्टी और फूल लेकर आते हैं। मिट्टी और फूल को कूटकर भगवान गौरी-गौरा की मूर्ति बनाई जाती है।
विधिवत गौरी-गौरा के चौरा पर लाकर की जाती है स्थापना - मनोहर पाटिल ने बताया कि विधिवत गौरी गौरा के चौरा पर लाकर उसकी स्थापना की जाती है। भगवान शंकर और माता पार्वती के विवाह के साथ रात भर इसकी सेवा की जाती है। सुबह पारंपरिक रूप से इसे गांव में घुमाया जाता है। जहां पर लोग जगह-जगह भगवान की पूजा अर्चना करते हैं। इसके अलावा शोटा भी लिया जाता है, तत्पश्चात इसे तालाब में ले जाकर विसर्जन किया जाता है।
हाथों पर सोंटा खाने की मान्यता - मटिया (बारगांव) में गौरा-गौरी पूजा मनाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है। गांव के भारत साहू व तिहारू निषाद ने बताया कि गोवर्धन पूजा और गौरा-गौरी पूजा के अवसर पर अपने हाथों पर सोटा खाने की मान्यता है। ऐसी मान्यता है कि सोंटा से मार खाने के बाद सभी तरह के दुख और परेशानियां दूर हो जाती है।
मां लक्ष्मी की पूजा कर रात में परघाते हैं करसा, पूजते हैं गौरा-गौरी - गौरा-गौरी समिति के प्रमुख गजरा ध्रुव बताती है कि दीपावली की रात को लक्ष्मी पूजा के बाद गौरा-गौरी की मूर्ति बनाई जाती है। इसे कुंवारी लड़कियां सिर पर कलश सहित रखकर मोहल्ले-गांव का भ्रमण करती हैं। टोकरीनुमा कलश में दूध में उबाले गए चावल के आटा से बना प्रसाद रखा जाता है। जिसे दूधफरा कहा जाता है। इसमें घी-तेल का उपयोग नहीं किया जाता है। यही पकवान गौरा-गौरी को भोग लगाया जाता है। जिसे दूसरे दिन सभी लोग ग्रहण करते हैं। सबसे खास बात यह है कि लक्ष्मी पूजा के दिन दोपहर में गांव के तलाब से मिट्टी लाया जाता हैं, उक्त मिट्टी से अलग अलग स्थानों में गौरा गौरी की मूर्ति बनाई जाती हैं, जिसके बाद विवाह की तैयारी की जाती हैं। गौरा की और से ग्रामीण गौरी के घर बारात लेकर आते हैं, वही गौरी के तरफ से ग्रामीण बारात का स्वागत करते हैं जिसके बाद शादी की पूरी रस्में इसी रात में पूरी की जाती है और गौरा गौरी को गौरा चौरा में रखा जाता हैं। जिसका गोवर्धन पूजा के दिन सुबह विधी विधान के साथ तलाब में विसर्जित किया जाता है। यह छत्तीसगढ़ के बैगा आदिवासी जनजातियों गोड़ जाति के लिए सबसे प्रमुख है।