पशुधन, वाहनों व औजारों की साफ सफाई कर की गई पूजा अर्चना
बेमेतरा 12 अगस्त 2026 - छत्तीसगढ़ का पारंपरिक त्यौहार हरेली पर्व बुधवार को बेमेतरा जिलें के बेरला ब्लाक के ग्राम बारगांव में धूमधाम से मनाया गया। गांवों में किसानों द्वारा कृषि कार्य में उपयोग में आने वाले हल सहित अन्य औजारों की साफ सफाई कर पूजा अर्चना की गई।
इस दरमियान मटिया में भाजपा पूर्व जिला महामंत्री नरेंद्र वर्मा व कोसपातर में जिला कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष विजय पारख ने अपने घर के पुस्तैनी किसानी औजार जैसे हल (नागर), फावड़ा, कुदाली (गैंती), हंसिया एवं खेती किसानी के अन्य छोटे बड़े औजार को साफ सुथरा धोकर, गोबर से लिपे पुते और रंगोली से सजे आंगन में रखकर पूजा किये।
हरियाली त्यौहार को लेकर बच्चों एवं किसानों में खासा उत्साह देखने को मिला। बच्चों द्वारा लकड़ी से बने गेडी़ चढकर हरेली त्यौहार मनाया तो वहीं युवाओं ने नारियल फेंककर दांव लगाया।
हरेली हैं को गेड़ी चढ़ने का त्योहार
हरेली त्यौहार को गेड़ी चढ़ने का त्योहार भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन लोग बांस की लकड़ी से गेड़ी बनाकर गेड़ी चढ़ते हैं , गेड़ी चढ़ने का आनंद ही अलग है लोग इस दिन गेड़ी चढ़कर आनंद उत्सव मनाते हैं।
गाय बैल को खिलाते हैं लौंदी
हरेली के पर्व पर पर सभी किसान व ग्रामीणजन अपने अपने घर के पुस्तैनी किसानी औजार जैसे हल (नागर), फावड़ा, कुदाली (गैंती), हंसिया एवं खेती किसानी के अन्य छोटे बड़े औजार को साफ सुथरा धोकर, गोबर से लिपे पुते और रंगोली से सजे आंगन में रखकर पूजा किये। औजारों की साफ-सफाई तथा मरम्मत का कार्य भी वर्ष भर के लिए पूर्ण हो जाता है। गाय बैलों को निरोगी बनाए रखने के लिए हरेली के दिन नमक और औषधियुक्त पौधों की पत्तियों को पीसकर "लौंदी" बनाकर खिलाया गया। इससे पशुधन की रक्षा होती है।
नीम पत्ती घर द्वार में लगाने की परंपरा
हरेली के पर्व में गांव-गांव घर-घर के द्वार पर नीम की टहनियां को टांगने का रिवाज है। इसके पीछे एक बड़ा कारण यही है कि बरसात के मौसम में विविध प्रकार की बीमारियां का जन्म और फैलाव होता है। ऐसी बीमारियों को जन्म देने वाले कीटाणु को मारने की ताकत नीम की पत्ती में होती है, यह पत्ती संक्रमण को रोकने और प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में भी सहायक है, अतः हरेली पर्व पर नीम की पत्तियां लगाने की प्रथा अत्यंत पुरानी है। इस दृष्टि से हरेली का त्योहार पेड़ पौधों की भी सुरक्षा और मानव जीवन में स्वच्छ पर्यावरण की उपादेयता को भी बताता है।
चौखट पर कील ठोकने का रिवाज
हरेली पर्व के दिन घर-घर के बाहर दरवाजे के चौखट पर गांव के लोहार द्वारा कील ठोकने की भी प्रथा है। इसके पीछे एक बड़ा राज यही छुपा हुआ है कि वर्षा काल में बरसते बादल और बिजली गिरने का बड़ा खतरा होता है। ऐसी आकाशीय बिजली को लोहे से निर्मित वस्तुएं अपनी और खींच कर जमीन में समाहित कर देती हैं, जिससे जीव जंतुओं पर बिजली गिरने का खतरा कम हो जाता है। हालांकि आज के जमाने में अब अधिकांश घरों में लोहे से निर्मित खिड़की ग्रिल दरवाजे लगाने का प्रचलन है इसीलिए अब चौखट पर कील ठोकने की प्रथा भी लगभग समाप्त हो चली है। ये पुरानी प्रथाएं रिवाज हमें बताते हैं कि वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित हैं हमारी अधिकांश पारंपरिक प्रथाएं, जिन्हें हमारे अनपढ़ पुरखों ने अपने व्यावहारिक ज्ञान के बूते आजमाया है।
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