जब तक व्यक्ति अहंकार का त्याग नहीं करता, तब तक अहंकार उसके जीवन से नहीं होता दूर - पंडित खिलेंद्र दुबे

जब तक व्यक्ति अहंकार का त्याग नहीं करता, तब तक अहंकार उसके जीवन से नहीं होता दूर - पंडित खिलेंद्र दुबे 

श्रीमद्भागवत कथा बारगांव (बेरला) में श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन 
प्रमोद गुप्ता/बेमेतरा/बेरला 23 दिसंबर 2025 - बेमेतरा जिले के बेरला ब्लाक के ग्राम बारगांव में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन मंगलवार को भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन किया गया। इस मौके पर कथावाचक पंडित खिलेंद्र दुबे ने संगीतमय कथा वाचन कर भगवान की बाल लीलाओं के चरित्र का वर्णन किया। 
         श्रोताओं से कहा कि लीला और क्रिया में अंतर होती है। अभिमान तथा सुखी रहने की इच्छा प्रक्रिया कहलाती है। इसे ना तो कर्तव्य का अभिमान है और ना ही सुखी रहने की इच्छा, बल्कि दूसरों को सुखी रखने की इच्छा को लीला कहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने यही लीला की, जिससे समस्त गोकुलवासी सुखी और संपन्न थे। उन्होंने कहा कि माखन चोरी करने का आशय मन की चोरी से है। कन्हैया ने भक्तों के मन की चोरी की। 
उन्होंने तमाम बाल लीलाओं का वर्णन करते हुए उपस्थित श्रोताओं को वात्सल्य प्रेम में सराबोर कर दिया। उन्होंने कहा कि भगवान कृष्ण के जन्म लेने पर कंस उनकी मृत्यु के लिए राज्य की सबसे बलवान राक्षसी पूतना को भेजता है। राक्षसी पूतना भेष बदलकर भगवान कृष्ण को अपने स्तन से जहरीला दूध पिलाने का प्रयास करती है, परंतु भगवान उसका वध कर देते हैं। इसी प्रकार कार्तिक माह में ब्रजवासी भगवान इंद्र को प्रसन्न करने के लिए पूजन कार्यक्रम की तैयारी करते हैं, परंतु भगवान कृष्ण उनको इंद्र की पूजा करने से मना कर देते हैं और गोवर्धन की पूजा करने के लिए कहते हैं। यह बात सुनकर भगवान इंद्र नाराज हो जाते हैं और गोकुल को बहाने के लिए भारी वर्षा करते हैं। इसे देखकर समस्त ब्रजवासी परेशान हो जाते हैं। भारी वर्षा को देखकर भगवान कृष्ण कनिष्ठ अंगुली पर गोवर्धन पर्वत को उठाकर सभी लोगों को उसके नीचे छिपा लेते हैं। भगवान द्वारा गोवर्धन पर्वत को उठाकर लोगों को बचाने से इंद्र का घमंड चकनाचूर हो गया। मथुरा को कंस के आतंक से बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया। 

जब तक व्यक्ति अहंकार का त्याग नहीं करता, तब तक उसके जीवन से दूर नहीं होता अंधकार - पंडित खिलेंद्र दुबे 
कथावाचक पंडित खिलेंद्र दुबे ने गोवर्धन लीला का भावपूर्ण वर्णन किया। इस अवसर पर उन्होंने संदेश दिया कि जब तक व्यक्ति अहंकार का त्याग नहीं करता, तब तक उसके जीवन से अंधकार दूर नहीं होता। उन्होंने बताया कि जब ब्रजवासी इंद्रदेव की पूजा की तैयारी कर रहे थे, तब भगवान कृष्ण ने उन्हें गोवर्धन पूजा करने का सुझाव दिया। इससे क्रोधित होकर इंद्रदेव ने भारी वर्षा कर दी। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठा उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर मथुरा, गोकुल और वृंदावन के लोगों की रक्षा की। बाद में इंद्रदेव ने घमंड छोड़कर क्षमा मांगी, जिसके बाद से गोवर्धन पूजा की परंपरा शुरू हुई। इस अवसर पर कथा पंडाल को भव्य सजावट से सजाया गया। श्रद्धालुओं ने गोवर्धन महाराज की प्रतिमा के समक्ष नृत्य किया और भगवान श्रीकृष्ण व गोवर्धन महाराज के जयकारे लगाए। भगवान को छप्पन भोग अर्पित किया गया।