लोकपर्व छेरछेरा दानशीलता की परंपरा को दिलाता है याद, मटिया (बारगांव/बेरला) में धूमधाम के साथ मनाया गया पर्व

सुबह से ही बच्चों ने टोलियों बनाकर घर-घर पहुचे, द्वार-द्वार पर लगी गूंज छेरछेरा कोठी के धान ल हेरते हेरा 
 
प्रमोद गुप्ता/बेमेतरा/बेरला 04 जनवरी 2026 - छत्तीसगढ़ का लोकपर्व छेर-छेरा पर्व शनिवार को ग्राम मटिया (बारगांव/बेरला) में धूमधाम के साथ मनाया गया। यह पर्व पौष पूर्णिमा के दिन खास तौर पर मनाया जाता है। यह अन्न दान का महापर्व है। सुबह 5 बजे से ही बच्चों को टोलियों में घर-घर जाकर उत्साहपूर्वक छेरछेरा कहते हुए खुशियां बांटते और अन्नदान का प्रसाद प्राप्त करते देखा गया। उत्सवों की संस्कृति समेटे छत्तीसगढ़ अपने लोकपर्व के माध्यम से सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करने के लिए सदियों से संकल्पित रहा है। 
इसी क्रम में बेरला क्षेत्र के ग्राम मटिया (बारगांव/बेरला) में भी छत्तीसगढ़ की संस्कृति व परंपरा की महक बिखेरते लोक पर्व छेरछेरा का उत्साह देखा गया। सुबह से निकली बच्चों की टोली गांव मोहल्ला व बस्ती से गुजरते हुए कहती जा रही थी- छेरछेरा कोठी के धान ल हेरते हेरा। इस त्यौहार का इंतजार बच्चों के साथ युवाओं को भी रहता है। यह पर्व फसल को खलिहान से घर लाने के बाद मनाया जाता है। इसी तरह ग्राम बलौदी, मुड़पार, पाहंदा, जमघट, अछोली एवं आस-पास के सभी क्षेत्रों में छत्तीसगढ़ का यह पारंपरिक त्यौहार धूमधाम से मनाया गया।

प्रत्येक घर से मिलती है धान व नगद राशि 
यह उत्सव कृषि प्रधान संस्कृति में दानशीलता की परंपरा का प्रतीक है। इसका पालन श्रद्धा भाव से किया जाता है। लोक परंपरा के अनुसार पौष महीने की पूर्णिमा को प्रतिवर्ष छेरछेरा का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन सुबह से ही बच्चे, युवक व युवतियां हाथ में टोकरी, बोरी आदि लेकर घर-घर छेरछेरा मांगते हैं। धान मिसाई हो जाने के चलते गांव में घर-घर धान का भंडारण होता है, जिसके चलते लोग छेरछेरा मांगने वालों को दान करते हैं। इन्हें हर घर से धान, चावल व नगद राशि मिलती है।