सच्चा मित्र वही है, जो अपने मित्र की परेशानी को समझे - पंडित खिलेंद्र दुबे

सच्चा मित्र वही है, जो अपने मित्र की परेशानी को समझे - पंडित खिलेंद्र दुबे 

बारगांव (बेरला) में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन, तुलसी वर्ष व पूर्णाहुति होगी आज 
प्रमोद गुप्ता/बेमेतरा/बेरला 25 दिसम्बर 2025 - बेमेतरा जिले के बेरला ब्लाक के ग्राम बारगांव में श्रीमद् भागवत कथा के सातवें दिन गुरुवार को सुदामा चरित्र का वर्णन किया गया। कथावाचक पंडित खिलेंद्र दुबे (खमतराई वाले) द्वारा सुदामा चरित्र का वर्णन किए जाने पर पंडाल में उपस्थित श्रोता भाव-विभोर हो गए। 
सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए पंडित श्री दुबे ने कहा कि मित्रता करो, तो भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा जैसी करो। सच्चा मित्र वही है, जो अपने मित्र की परेशानी को समझे और बिना बताए ही मदद कर दे। परंतु आजकल स्वार्थ की मित्रता रह गई है। जब तक स्वार्थ सिद्ध नहीं होता है, तब तक मित्रता रहती है। जब स्वार्थ पूरा हो जाता है, मित्रता खत्म हो जाती है। 
उन्होंने कहा कि एक सुदामा अपनी पत्नी के कहने पर मित्र कृष्ण से मिलने द्वारकापुरी जाते हैं। जब वह महल के गेट पर पहुंच जाते हैं, तब प्रहरियों से कृष्ण को अपना मित्र बताते है और अंदर जाने की बात कहते हैं। सुदामा की यह बात सुनकर प्रहरी उनका उपहास उड़ाते है और कहते है कि भगवान श्रीकृष्ण का मित्र एक दरिद्र व्यक्ति कैसे हो सकता है। प्रहरियों की बात सुनकर सुदामा अपने मित्र से बिना मिले ही लौटने लगते हैं। तभी एक प्रहरी महल के अंदर जाकर भगवान श्रीकृष्ण को बताता है कि महल के द्वार पर एक सुदामा नाम का दरिद्र व्यक्ति खड़ा है और अपने आप को आपका मित्र बता रहा है। जैसे ही द्वारपाल के मुंह से उन्होंने सुदामा का नाम सुना, प्रभु सुदामा... सुदामा... कहते हुए तेजी से द्वार की तरफ भागे।सामने सुदामा सखा को देखकर उन्होंने उसे अपने सीने से लगा लिया। सुदामा ने भी कन्हैया.. कन्हैया.. कहकर उन्हें गले लगाया और सुदामा को अपने महल में ले गए ओर उनका अभिनंदन किया। इस दृश्य को देखकर श्रोता भाव विभोर हो गए।

भगवान के प्रति निश्छल भक्ति की मिलती है सीख 
श्रीमद्भागवत कथा में सुदामा से हमें सच्ची, निस्वार्थ मित्रता, विपरीत परिस्थितियों में धैर्य, गुरु-शिष्य प्रेम और भगवान के प्रति निश्छल भक्ति की सीख मिलती है, जहाँ धन या गरीबी मायने नहीं रखती, बल्कि प्रेम और समर्पण सबसे महत्वपूर्ण है और भगवान बिना मांगे ही अपने भक्तों को सब कुछ प्रदान कर देते हैं। सुदामा और कृष्ण की दोस्ती यह सिखाती है कि सच्ची मित्रता में अमीरी-गरीबी का भेद नहीं होता। सच्चा मित्र वह है जो मुश्किल समय में साथ दे और सही राह दिखाए।  
     सुदामा भगवान के पास गए, पर अपने लिए कुछ नहीं मांगा, केवल अपने मित्र से मिलना चाहा। यह निस्वार्थ समर्पण और भक्ति का प्रतीक है, जो ईश्वर को सबसे प्रिय है। सुदामा ने गरीबी में भी धैर्य नहीं खोया। यह हमें सिखाता है कि जीवन की कठिनाइयों का सामना धैर्य और विश्वास के साथ करना चाहिए।